भोजपुरी गजल Bhojpuri Gajal











{July 28, 2007}   www.manojbhawuk.com

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Bhojpuri Poet, Writer, and Film-critic.

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Diwali

अबकी दियरी के परब अइसे मनावल जाये
मन के अँगना में एगो दीप जरावल जाये

रोशनी गाँव में, दिल्ली से ले आवल जाये
कैद सूरज के अब आजाद करावल जाये

हिन्दू, मुसलिम ना, ईसाई ना, सिक्ख, ए भाई
अपना औलाद के इंसान बनावल जाये

जेमें भगवान, खुदा, गौड सभे साथ रहे
एह तरह के एगो देवास बनावल जाये

रोज़ दियरी बा कहीं, रोज़ कहीं भूखमरी
काश ! दुनिया से विषमता के मिटावल जाये

सूप, चलनी के पटकला से भला का होई
श्रम के लाठी से दलिद्दर के भगावल जाये

लाख रस्ता हो कठिन ,लाख दूर मंजिल हो
आस के फूल हीं आँखिन मे उगावल जाये

जेकरा यादन में जले दिल के दिया के बाती
ए सखी, अब ओही ‘भावुक’ के बोलावल जाये



कइसन-कइसन काम नधाइल बाटे इंटरनेट पर
माउस धइले लोग धधाइल बाटे इंटरनेट पर

सर्च करीं जे चाहीं रउरा घरहीं बइठल-बइठल अब
सबके वेवसाइट छितराइल बाटे इंटरनेट पर

बेदेखल-बेजानल चेहरा से भी प्यार-मुहब्बत अब
अजबे-गजबे मंत्र मराइल बाटे इंटरनेट पर

जब-जब कैफे वाला कहलस सर्वर डाउन बा मालिक
तब-तब बहुते मन बिखियाइल बाटे इंटरनेट पर

रूस,कनाडा,चीन,जर्मनी,भारत,यू.एस या लंदन
एक सूत्र में लोग बन्हाइल बाटे इंटरनेट पर

शाली से जब पूछनी ,’ काहो- दुल्हा कतहूँ सेट भइल’
कहली उ मुस्कात ‘ खोजाइल बाटे इंटरनेट पर

मन के अँगना में गूँजत बा ‘भावुक’ हो तोहरे बतिया
गोरिया के लव-लेटर आइल बाटे इंटरनेट पर



जिनिगी पहाड़ जइसन लागे कबो-कबो
सुखला में बाढ़ जइसन लागे कबो-कबो

कुछुओ कहाँ बा आपन, झूठो के बा भरम
साँसो उधार जइसन लागे कबो-कबो

सभकर बा हाथ पसरल मंदिर में देखलीं
दुनिया भिखार जइसन लागे कबो-कबो

डोली ई देह लागे, दुलहिन ई आत्मा
जिनिगी कँहार जइसन लागे कबो-कबो

होखे महल या मड़ई पर प्यार के बिना
सगरो उजाड़ जइसन लागे कबो-कबो

जहिया से नेह लागल ‘भावुक’ के गीत से
नफरत दुलार जइसन लागे कबो-कबो

*
पटना दूरदर्शन के भोजपुरी धारावाहिक ‘ तहरे से घर बसाएब’ [ कथा,पटकथा,संवाद एवं गीत- मनोज भावुक ] मे फिल्मावल गजल



नया-नया संसार में बानी सात समुन्दर पार
बाकिर हियरा मे बाटे, इहवों तहरे संसार

जिन्दा रखिहऽ अपना मन में हमरा खातिर प्यार
हम दुनिया मे आइब तहरा खातिर सौ-सौ बार

रोक ना लेबे हमरा के केहू के छलकत आँख
चलनी तऽ पीछे मुड़ के देखनी ना एको बार

एगो राजकुमारी के अक्सर आवत बा फोन
कब ले अइबऽ लौट के बोलऽ-बोलऽ राजकुमार

मजबूरी में हीं छिछियाला केहू देश-विदेश
ना तऽ सभका भावे अपना घर के रोटी यार

ए-बबुआ नइखे हमरा पाउण्ड-डालर के काम
रहऽ आँख के सोझा हरदम माई कहे हमार 
 



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{October 5, 2006}  

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मनोज भावुक

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